Monday, April 11, 2011

रिटायरमेंट डे

सरोजिनी नगर सी-ब्लॉक के गेट के सामने की सड़क को एक महिला तेज़ी से पार करती है। सामने दूसरी तरफ एक सफेद रंग की चार्टर्ड गाड़ी खड़ी है। महिला तेज़ी से उस बस के पहले पायदान पर चढ़ती है। खिड़की के पास बैठा आदमी कहता है – “अरे मैडम आज भी देर कर दी आपने आने में! लेकिन आज मैंने पूरे पाँच मिनट तक आपकी वेट की है। आज तो ख़ास दिन है!” – अंतिम वाक्य को मुँह में अदा से गोल -गोल घुमाते हुए कहा।
पायदान पर खड़ी मैडम की साँस धीमे होकर एकाएक फक-फक कर चलने लगी। एक अजीब बिखरी हुई अफरा-तफरी की आदत हो गई थी, जो ज़िन्दगी में समा गई थी और कब छूटते हुए मिनटों के पीछे भागना ही दिन की शुरुआत और रात का रुटीन बन गया था, सच में मैडम को पता ही नहीं चल था। बस के हेल्पर के साथ बैठे आदमी ने तपाक से कहा – “आज क्या बात है, भई!” “आज मैडम का आखिरी दिन है” मैडम अपने हाथों से पर्स को भींचकर बस में बैठे हर शख़्स की ओर मुस्कुराते हुए सबसे पीछे की सीट पर कोने में खिड़की के पास छिपकर बैठ गईं। उनके आगे की सीट पर तीन औरतें बैठी थीं। एक थीं मिसेज सक्सेना, दूसरी मिसेज सिब्बल, तीसरी मिसेज घोष। मिसेज घोष मुड़कर, मुस्कुराते हुए कहने लगीं – “आज आप रिटायर हो रही हैं। कितने साल हो गए आपको?” “तैंतीस साल” “वाह! आज तो आप आराम से जा सकती थीं, आज जल्दी क्यों जा रही हैं?” “यूँ हीं” “अच्छा है.......” “कितने बच्चे हैं आपके?” “जी...मैं शादीशुदा नहीं हूँ, मतलब मैंने शादी नहीं की है” “अरे, आप तो सरकारी क्वार्टर में रहती हैं न! फिर आप कहाँ रहेंगी? परिवार में बाकी लोग.....” “जी, कोई नहीं” – जब बहुत कुछ विस्तार से कहने का मन नहीं करे तो बस कुछ शब्द चुनकर सामने वाले के मुँह पर पोथ देने की मैडम की पुरानी आदत थी।
मैडम बाहर की तरफ देखने लगती हैं। उन्हें पता नहीं था कि मिसेज घोष अभी भी उन्हें ही देख रही होती हैं। आँखों के किनारे कभी इतने ऊँचे हो जाते हैं कि जने कितने नमकीन समन्दर समा जाते हैं उसमें। आज पानी फिर तैर गया। शायद पानी को आदत हो गई है बांध तोड़कर बाहर न आने की।
आज मैडम बाहर देख रही हैं बड़े गौर से सभी चीज़ों को। ट्रैफिक, गाड़ियाँ, पेड़, सड़क, दुकानें। आज लग रहा था उन्हें कि यह सब मेरे आसपास घूम रहा है, तेज़ी से, नज़रें टिक नहीं पा रही हैं, देखने को एक नया पल मिला था। कभी पल ही चीज़ों को नए सिरे से देखने के लिए मजबूर करते हैं। आज उन्होंने मिसेज घोष, सक्सेना व सिब्बल को भी घूर कर देखा, इसलिए नहीं कि अपने खालीपन को दिखाने के लिए चेहरे पर तनाव और ईर्ष्या लिए घूमें लेकिन इसलिए कि शायद यूँ हीं। बस ऑफिस के बाहर रुकी। मैडम उतरकर ऑफिस बिल्डिंग की तरफ जाने लगीं। मन में चाह उठी ‘काश! यह बिल्डिंग ग्रे नहीं लाल होती! यहाँ पार्किंग नहीं छोटी-छोटी घास....’ इन्हीं चाहतों की तरंगों को गेट कीपर ने तोड़ा – “गुडमार्निंग मैडम! आज के दिन की बधाई” – साथ में खड़े साथी ने टोका – “बुद्धू बधाई नहीं देते हैं आखिरी दिन की”- आज गेट पर दुबारा दबा-कुचला, मुरझाया हुआ आखिरी दिन लपककर, मैडम पर चिपककर उनकी गर्दन पर जा बैठा। उस दिन को गले से छुड़ाते हुए मैडम बोलीं – “अरे, कोई बात नहीं। और, कैसे हैं?” “ठीक हैं!”
“जी, आशीर्वाद है आपका” “अरे नहीं नहीं”
मैडम ने चौथी मंजिल के लिए लिफ्ट का बटन दबाया। लिफ्ट चलने ही वाली थी कि मिस्टर चक्रवर्ती सामने से भागते हुए आए और साथ में मिस्टर पांडे थे। लिफ्ट चली और बात फिर चली।
“मैडम आज तो आखिरी दिन है। आगे का क्या सोचा, कहाँ रहना है” “कहाँ रहना मतलब, मिस्टर चक्रवर्ती?” – पांडे जी ने चौंककर कहा। “मैडम ने शादी नहीं बनाया और कोई नहीं है इनका, ऐसा सुनने में आया है मैडम” “जी.........अभी तो सरकारी क्वार्टर में ही रहना होगा” लिफ्ट रुकी। मैडम थोड़ा आगे निकलीं तो केश के शर्मा जी आखिरी दिन के कुछ पेपर साइन करने के लिए मैडम को थमा गए। मैडम के कानों में दुबारा आवाज़ पड़ी –
“यार एक बात बता। लोग बिना शादी किए रह कैसे जाते हैं, जीते कैसे हैं! इतने पैसों का क्या करेंगे.........” “अरे, मैडम तो कुँवारी ही रिटायर हो गईं” “ये लोग पैसे वैसे का क्या करेंगे, न बाल न बच्चा, न परिवार, कैसा लगता होगा” किसने क्या कहा – यह मायने नहीं रखता, रखता तो केवल यह कि कहा गया। मैडम के साइन करते हुए हाथ लड़खड़ाने लगे। लगा, ये काली स्याही फैलकर, सांप बन पूरे कागज़ पर रेंग रही है। मैडम ने पेपर छ्टक दिया। आसपास देखकर दुबारा नीचे पड़े पेपर को उठाया और साइन कर दिया। मैडम सेक्शन में पहुँचीं और अपने टेबल पर बैठ गईं। बैठकर अहसास हुआ कि यह भी आखिरी बार। ड्रॉअर खोला – सामने तीन रिनॉल्ड्स, दो रबर, टैग का एक गुच्छा, दो व्हाइटनर, आलपीन की दो डिब्बियाँ रखीं थीं। मैडम ने स्टेपलर उठाया। वह सोच रहीं थीं कितनी ही बार इसमें पिन फँसा था। ड्रॉअर में रखे फोल्डर को निकालकर देखा और पुराने रद्दी पेपरों को फाड़ने लगीं। एक मोटी तहों वाले बंडल को फाड़ते-फाड़ते वे उस पेपर पर पहुँचीं जहाँ से शुरुआत हुई थी। मैडम की ज्वॉइनिंग रिपोर्ट। सतीश ने टाइप की थी यह। अपने घर के टाइपराइटर पर। फिर उस दिन से ठीक पाँच दिन बाद वो हुआ जो अभी भी मैडम में ज़िंदा है। उनकी सादगी में एक हताशा है, उनके बेरंग कपड़ों में काली स्याह भावों का धुआँ है, मशीन की ज़िन्दगी में कसमसाहट है, ऊब है।
मैडम अपने हाथों के पोरों से उस कागज़ के अक्षर पर अक्षर बनाने लगीं। मानों हाथ कह रहे हों ‘अक्षर को कालापन उसका भाव नहीं देता, अक्षर तो हवा में बनने वाले घेरे हैं जो दिखाई नहीं देते लेकिन उनके पीछे हाथ घूमता है तो लगता है अक्षर हवा में तैर रहे हों। मैडम को टोकने फिर कुछ लोग आते हैं जो फिर वही बातें करते हैं – कितने साल, कब आई, कैसे, कहाँ, क्यूँ, अब आगे क्या, जो हुआ क्या वो अच्छा वो बुरा, कैसे वक्त बीता.................................??? रिटयरमेंट पार्टी बैठक कक्ष में हुई। कुछ लोग आए, कुछ घर गए पार्टी जो थी – क्या करना है जाकर.......... मैडम के लिए दो शब्द केवल बनावटी, अच्छे वाले....................देने को एक फॉरमैलिटी के तौर पर बेडशीट कढ़ाई वाली। मैडम आज फिर चुप थीं, केवल मुस्कुरा रही थां। यह तो ज़रूरी था। फॉरमैलिटी आ जाए तो ज़िन्दगी को फॉर्मल तरीके से ढका जा सकता है नहीं तो चेहर और ज़िन्दगी इन्फॉर्मल होकर रह जाती है। यानि खाने के साथ प्रोसे जाने वाला अचार जो गप्पियों और ठहाकाबाज़ों की चुस्की होती है।
पार्टी में दो शब्द के तौर पर सहायक निदेशक महोदय श्री शुक्ला ने कहा - “मैडम कर्मठ कर्मचारी थीं। काम को उन्होंने पूजा................” मैडम की आँखें मिसेज खन्ना पर टिक गईं। उनकी लिपस्टिक से पुते होठों पर कुढ़न लिपग्लॉस का काम कर रही थी। मैडम जानती थीं वह मन में कह रही होंगीं – “हर टाइम तो ऑफिस में सड़ी रहती है यह लेडी! हमारा तो घर है, परिवार है। ये छुट्टी नहीं लेती, इसका है कौन........काम नहीं करेगी तो टाइम पास कैसे होगा” “हम मैडम की आगे की स्वस्थ और खुशहाल ज़िन्दगी की कामना करते हैं........................।”
पार्टी हुई, मैडम को कहा गया आते रहना, सबने कहा अच्छा समय बीता.......एक फॉरमैलिटी और थी....सरकारी गाड़ी घर पर छोड़ने जाती है....मैडम के साथ गाड़ी में कोई नहीं गया........यूँ हीं। फॉरमैलिटी के तौर पर शब्द कहे जा सकते हैं लेकिन शायद ज़िन्दगी को इन फॉरमल शब्दों के सहारे छोड़ा नहीं जा सकता, ज़िन्दगी जी जाती है या ज़िन्दगी को कभी जीना पड़ता है।
आज मैडम के क्वार्टर की खिड़की से चांद झाँक रहा था और मैडम एक पुरानी किताब के पन्नों में रखे गुलाब के सूखे फूल को हाथों से छू रही थीं। उस रात चांद उस खिड़की पर ही ठहर गया। मैंने चांद से पूछ, “ऐसा क्यों”, उसने भी कहा, “यूँ हीं”

Tuesday, March 22, 2011

यह एक बहुत पुराना सा साल

एक साल बीत गया
ख़ामोशियों, तनहाइयों
और समझौतों से भरी
इस एक साल की ज़िंदगी
बड़ी डरावनी रही।
जाने कितने सन्नाटे आए और यहीं के होकर रह गए
जाने कितनी मजबूरियों ने इस दिल पर कितने कहर किए
अटकती, भटकती साँसों के बीच ज़िंदा
एक मरा सा दिल
जाने कितनी ज़िंदगियाँ जीता
अपने-आप को सहारा देता
मुस्कुराहट देने की अधूरी कोशिश करता
साथ चलते इस तानाशाह, बेरुख़े, भयंकर से समय को अनचीन्हा छोड़ता
सदमों की राहों पर
भागता-छिपता-फिरता
कभी रोता, कभी चीखता, कभी घबराता, डरता
कभी गुमसुम, चुपचाप बैठता,
थककर भागता
ये पराया सा बेवकूफ दिल
अपने-आप की गिरफ़्त से छूटता
छटपटाता
इस साल तक कई सालों को जीता रहा
या शायद जीने का अर्थ मिटाता हुआ
अपने-आप से रीत गया,
यह एक बहुत पुराना सा साल
बहुत धीरे-धीरे करके
बहुत कुछ साथ लेकर, सब कुछ मिटाकर, कुछ-कुछ ज़िंदा छोड़कर
बीत गया।


(उस एक नादान से दिल के लिए और उसकी एक नादानी के लिए)

Friday, March 18, 2011

और धुआँ ना उठे

मेरी माटी जल जाए
और धुआँ ना उठे
मैं ख़ाक हो जाऊँ
और धुआँ ना उठे

मेरा आसमाँ खिले
दो जहाँ से मिले
मेरी याद मिट जाए
और धुआँ ना उठे

मेरा रास्ता चले
अपनी मंज़िल तले
ये क़दम बहक जाएँ
और धुआँ ना उठे

वहीं चाँद थम जाए
जहाँ सूरज ढले
रौशनी पिघल जाए
और धुआँ ना उठे

ये हवा भी थम जाए
मौसम बदल जाए
मेरे पर सम्हल जाएँ
और धुआँ ना उठे

Saturday, March 12, 2011

एक अजीब सी दुनिया हो गई है ये...लोग तभी बिलखते हैं जब उनके ख़ुद के दिल में दर्द होता है...सब कुछ अपने हिसाब से ....दूसरों की त्वचा की मोटाई भी अपने हिसाब से देखना पसन्द करने वाली दुनिया, दूसरों की संवेदनशीलता पर भी अपना आधिपत्य जमाने वाली दुनिया....अजीब सी ख़ुदगर्ज़...

Tuesday, March 8, 2011

इस सुनहरी दिन की एक काली, अन्धेरी छाया भी है....

अभी-अभी ‘साझा-संसार’ में ‘बच्चियों का घर (चम्पानगर, भागलपुर) – 1 (http://saajha-sansaar.blogspot.com/2011/03/1.html) पढ़ा। अनाथालय चलाने वाले मोहम्मद मुन्ना साहब का एक कथन है, "फ़ायदा भी क्या है लड़कियों को पढ़ाने से?"

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर आज इस पंक्ति ने बड़ा ही अजीब सा माहौल बना दिया मन के अन्दर....शायद एक टीस, एक बेचैनी या शायद एक आहत मन की जानी-पहचानी आदत...hurt होने की....क्या करें ऐसी लड़कियों के लिए जिन्हें अभी से ही यह महसूस कराया जा रहा है कि स्कूली शिक्षा उनके लिए बेकार है, कि उन्हें सिर्फ क़ुरान के हिसाब से जीकर एक दिन मर जाना है...कि उनका मतलब सिर्फ घर, खाना बनाना, दब-छिप कर रहना, हर ज़्यादती को सामान्य रूप में लेना और अपने समर्थन में यदा-कदा किए गए किसी ‘हाँ’ को अपनी ख़ुशकिस्मती मानना ही है.......जाने क्या बहुत कुछ सा कहना चाहती हूँ पर मन अपने सामने शब्दों का आईना रखने से डरता है, डरता है कि कहीं फिर से एक ऐसी कोशिश का सामना न हो जाए जो आधी-अधूरी रह गई हो.....आज हममें बहुत सी ऐसी महिलाएँ हैं जो अपनी ख़्वाहिशों को जी रही हैं, जैसा ख़ुद जीना चाहती हैं वैसा जी रही हैं, अपने-अपने पसंद की ऊँचाईयाँ छू रही हैं...पर अभी बहुत से घर ऐसे हैं जहाँ लड़कियों ने अभी ये भी नहीं जाना कि वे लड़की होने से पहले इंसान हैं, कि ज़िन्दगी पाबन्दियों के पैबन्दों के अलावा भी कुछ है, बहुत कुछ है...

इंतज़ार में हूँ कि कब वो दिन देखूँगी जब हमें ईश्वर के इस अनमोल उपहार को यह बताना नहीं पड़ेगा कि आज़ादी क्या है, कि कब ऐसा दिन आएगा जब वे ख़ुद अपनी-अपनी आज़ादी को महसूस करेंगी......और इसके लिए उन्हें किसी की ज़रूरत नहीं पड़ेगी....न मेरी, न आपकी, न ख़ुदा के इनायत की....

Thursday, February 24, 2011

न जाने क्यों......

न जाने इस आईने का चेहरा हमसे मिलता क्यों है
हर बार मिलकर हमें अपना-सा वो लगता क्यों है

हर रात जब चाँद निकलता है छत पे
हमें देखकर हर बार वो हँसता क्यों है

हर राह एक राह से मिलती है जहाँ
उस राह पे चलता एक रस्ता क्यों है

रौशन हुई एक ज़िन्दगी जहाँ पर अपनी
उस ग़ैर का हर कदम वहाँ फिसलता क्यों है

किस राह पे चले और पहुँचे कहाँ हम
यह सोचकर हर बार दिल दुखता क्यों है

जिस रूह से मिल चुके हम कई दफ़ा
इस बार वो अजनबी-सा लगता क्यों है

वो जो आईना है अपने से चेहरे वाला
हर बार वो मिलकर कुछ टूटता क्यों है

Tuesday, February 8, 2011

......................................

सभी बेहद निराश थे। लड़के वालों ने ना कह दिया था। हमेशा से अच्छे फिगर वाली फुन्नू आज उन्हें बेहद दुबली-पतली, कमज़ोर-सी नज़र आ रही थी। क्या नहीं किया था इसे सजाने के लिए। कोई कसर न छोड़ रखी थी। पड़ोस की बिन्दु के घर से जाने कौन-कौन सी क्रीम लाई थी फुन्नू की माँ। नया सलवार-सूट, नई सैंडल, बालों में लगाने को क्लिप और बाला-चूड़ी के लिए पूरे चार घंटे बाज़ार का चक्कर लगाया था उन्होंने। सारी मेहनत और पैसों पर पानी फिर गया।

“अब यूँ मुँह लटकाने से कुछ नहीं होगा” – फुन्नू के पापा ने कहा – “इसकी शादी करनी है तो इसका वज़न बढ़ाना होगा। अब भाई लड़के वाले हैं पूरा नाप-तौल के, ठोक-बजा के, हर तरफ से देखेंगे ही। दस ऐंगल से देखा होगा उन्होंने।”

“लड़की है कोई गाय-बकरी थोड़े ही न है जो खरीदार को दिखाने के लिए ताज़ा-मोटा करेंगे” – माँ ने सोफे के नीचे से जूठे कप बटोरते हुए कहा।

“खरीदार तो हम हैं जो दीदी के लिए लड़का खरीद रहे हैं” – दरवाजे के पास खड़ी फुनकी ने बीच में कहा – “दहेज देकर”
“तू करना बिना दहेज के अपनी बेटी की शादी। बीच में टाँग अड़ा रही है। जा, जाकर दीदी को कह उतार दे सारा सिंगार। ठूँठ लकड़ी पर सिंगार नहीं जँचता”

पापा की बात सुन फुनकी वहाँ से हट गई थी। और फिर धीरे-धीरे कर सभी अपना लटका हुआ मुँह ले वहाँ से इधर-उधर हो गए थे।

मिश्रा जी की हालत इतनी अच्छी न थी कि वे पूरा खाना घी-दूध में बनवाते। पहले से ही राशनवाले पर दो-ढाई हज़ार का कर्ज़ बाकी था। इसलिए घर भर में सिर्फ फुन्नो को घी लगी रोटी मिलती – टपकते घी से तरबतर। ख़ासतौर से उसके लिए दोपहर को राज़मे की सब्ज़ी बनती – जितना प्रोटीन मिलेगा उतना मोटाएगी। खूब टमाटर खाने को मिलते, भूख से ज़्यादा रोटी दी जाती।

“जितनी जल्दी स्वास्थ्य सुधर जाए उतना अच्छा। देखो तो कैसी सींकड़ी लगती है। ऐसे में कौन इसे पसंद करेगा”

“इसकी शादी हो जाए तो फुनकी के लिए लड़का ढूँढें। इसके चक्कर में उसकी भी उमर निकल जाएगी” – माँ चिंता करतीं।

“नहीं, उमर की तो कोई बात नहीं है। ऐसी बड़ी भी नहीं हुई हैं दोनों। बस, देखने-सुनने में ज़रा अच्छी बनीं रहें। कहो उनसे कि दोनों अपना थोड़ा-बहुत ख़याल रखें”

“हाँ, वो तो रख रही हैं। फुन्नो के लिए जो फुल क्रीम दूध आता है, उसी में से लेकर दो-तीन चम्मच मलाई लगा देती हूँ दोनों को”

“हाँ, सो ही” – पापा अख़बार पढ़ते हुए कहते – “भई लड़कियों को सुन्दर तो होना ही पड़ता है। लड़के की कमाई और लड़की की ख़ूबसूरती, यही तो देखते हैं लोग। और, कुछ मोटाई की नहीं फुन्नो?”

“अभी तो शुरु ही किया है, कुछ दिनों में हो जाएगी” और फुन्नो को मोटा करने में परिवार वाले लगे रहे। अभी हाथ ज़रा पतले हैं, अभी दुहरी ठुड्डी नहीं आई, अभी कंधे की हड्डी दिखती है – और इन सबके बीच फुन्नो चुपचाप, बिना कुछ बोले उन सबके कहने पर चलती रही।

“दीदी को मोटा करने की चिंता में कहीं बाकी सभी न दुबले हो मरें” – फुनकी अक्सर हँसकर कहती।
घी टपकती रोटी देख फुन्नो ने एक दिन माँ से कहा था – “असली रोटी का स्वाद क्या होता है, ये तो मैं भूल ही गई माँ। एक रोटी तो बिना घी की दे दे”

“बलि के बकरे को देखा है कभी तूने? – फुनकी ने हमेशा की तरह अपनी चोटी घुमाते हुए कहा।

“चुप रह” – माँ ने बुरी तरह झिड़का – “हर जगह टाँग अड़ाती फिरती है। तुझे जलन हो रही है तो तू भी खा ले”

“ना। मैं तो ऐसी ही ठीक हूँ। जैसी हूँ वैसे में कोई पसंद करे तो ठीक है वरना जाए चूल्हे में। मुझे किसी के लिए कुछ घटाने-बढ़ाने का शौक नहीं”

“शौक किसे होता है बेटा” – एक हाथ से अपने माथे पर आए पसीने को आँचल से पोंछते हुए और दूसरे से तवे पर रखी रोटी पलटते हुए माँ ने कहा – “लेकिन मजबूरी भी तो कोई चीज़ होती है। आज अगर इसके दुबले होने के कारण कोई इसे पसंद नहीं करेगा तो कैसे करेंगे इसकी शादी? फिर तुझे भी तो ससुराल भेजना है। शादी ऐसे ही थोड़े न हो जाती है कि हाथ उठाया और कर दी” – माँ ने रोटी घी में चुपड़ा और फुन्नो की थाली में डाल दिया।

“माँ” – फुन्नो ने रोकते हुए कहा – “बिना घी की। मैंने कहा था” – लेकिन तबतक रोटी थाली में जा चुकी थी।

“क्यों नखरे करती है। जो दे रही हूँ खा चुपचाप। एक तो तेरी चिंता में हम घुले जा रहे हैं और तू है कि..........। जल्दी से वज़न बढ़ा। ये नहीं होता कि खा-पीकर जल्द-से-जल्द स्वास्थ्य सुधार लें। जानती है लोग क्या कहते हैं? कहते हैं, अरे वो, मिश्रा जी की लड़की? वो तो अभी बच्ची है! हाय राम, कब तक बच्ची बनी रहेगी तू? जल्दी से अपना घर-बार बसा। और अब खा चुपचाप।”

और फुन्नो खाती रही। चुपचाप। बिना कुछ बोले। परिवार में हर वक्त लोगों की निगाहें उसकी देह पर होतीं – “हाँ, अब तो कुछ-कुछ ठीक है, लेकिन अभी भी सब कुछ ठीक नहीं है” – ठीक सचमुच सब कुछ नहीं था। फुन्नो के बाहर भी और फुन्नो के भीतर भी। बाहर जितना सुधर रहा था, भीतर उतना बिगड़ रहा था। लेकिन किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया या शायद अपनी-अपनी मजबूरियों के सामने किसी ने इसकी परवाह नहीं की कि फुन्नो अब लोगों के सामने जाने से कतराने लगी थी। कि फुन्नो को ये सारी बातें ताने जैसी लगती थीं। औरों से ज़्यादा ख़ास बर्ताव – उसे काम नहीं करने थे, अधिक चलने-टहलने से मनाही थी, अपने कपड़े तक साफ करने पर पाबंदी थी – कहीं वापस कमज़ोर न हो जाए – औरों से ज़्यादा पौष्टिक आहार, औरों से कहीं ज़्यादा आराम, औरों से कहीं ज़्यादा ध्यान जो उसके शरीर पर बढ़ते माँस के एक-एक मिलीमीटर का हिसाब रखते। घर में हर किसी को उसी की चिंता रहती।
और इसी चिंता में घुले लोगों की नज़रें उसके बदलते व्यवहार पर न जा सकीं। फुन्नो अब ज़्यादातर समय अकेले बिताने लगी थी। उसे लेकर घर में जो कुछ भी हो रहा था, उसे अच्छा नहीं लग रहा था। तनाव होता था किसी के सामने जाने में, किसी से बात करने में, किसी की बात सुनने में – हर बार हर बात घुमा-फिरा कर वहीं ला दी जाती – फुन्नो का वज़न।
और वज़न बढ़ रहा था। चार किलो, पाँच किलो, छ: किलो और फुन्नो अब लड़के वालों को दिखाने लायक हो गई थी। प्रदर्शनी का समय हो गया था।

“चौबे जी लोग आने वाले हैं कल शाम को। सारी तैयारी कर लेनी होगी” – पापा ने दफ्तर से आते ही कहा।

“कल शाम को?”

“हाँ, कल शाम को। और कोई वक्त नहीं था उनके पास”

“लेकिन इतनी जल्दी कैसे करेंगे सबकुछ?” – माँ परेशान हो गईं।

“हो जाएगा। मिलजुल कर करेंगे, सब हो जाएगा। पहले काम शुरु तो करो”

और काम शुरु हो गया। परीक्षा देने आए चचेरे भाई ने सफाई का ज़िम्मा लिया। घर, आँगन, छत, स्टोर सभी जगह साफ करना होगा। जहाँ जाएँ उन्हें कहीं कोई गंदगी न दिखे। माँ व्यंजनों के लिस्ट में घुस गईं। फुनकी ने माँ का साथ दिया। पापा बाज़ार से लाने वाली सारी आवश्यक चीज़ों की लिस्ट में जा घुसे। घर में घूम-घूम कर देखा – ‘कप-प्लेट का पुराना सेट फीका पड़ गया है – लाना पड़ेगा, प्लास्टिक की एक ट्रे – पुरानी वाली थोड़ी चनक गई है, एक पाँव-पोछन – घर के बाहर रख देंगे, हाथ पोंछने को एक छोटा, सफेद तौलिया, हाथ धोने का साबुन भी नहीं है’
“डिटॉल का हैंडवॉश ले लेते हैं, थोड़ा स्टैंडर का लगेगा” – बरामदे की धूल झाड़ते भाई ने सुझाव दिया।

और इतने सारे कामों और काम करने वालों के बीच फुन्नो अकेली बैठी थी। काम करने से मनाही थी – चेहरे पर थकावट न आ जाए।

अगले दिन सुबह से फिर साफ-सफाई, झाड़ू-पौंछा। गुलदस्ते में सजे एक-एक फूल की एक-एक डाल, एक-एक पंखुड़ी तक पोंछी गई।
मिठाई, नमकीन, समोसे – जाने कितने सारे पकवान – कुछ माँ के बनाए, कुछ पापा के लाए। सारी तैयारियों के बीच पता ही न चला कब शाम हो गई।
चार बज गए। सभी तैयार होकर कुर्सी-टेबल के आस-पास आ गए। लड़के वाले आएँगे तो यहीं बैठेंगे। कौन कहाँ-कैसे बैठेगा ये भी तो तय करना था।
फुन्नो को आज फिर माँ ने उसी दिन की तरह तैयार किया – बल्कि इस बार थोड़ा अधिक ही। बहुत मुश्किल से खर्च किया है इसके ऊपर। किराने वाले पर पहले से ही कर्ज़ था, जाने कैसे उतारेंगे – इस बार रिजेक्टेड नहीं होनी चाहिए।

पाँच बज गए। सभी तैयार बैठे थे। बीच-बीच में पापा हुई तैयारियों को उठकर देख लेते। चाय-पानी, नाश्ता-खाना सबके इंतज़ाम पर नज़र डाल आते। आईने में जाकर बार-बार अपने बाल व्यवस्थित करते। घड़ी देखते। टिक-टिक-टिक-टिक।

“हाँ, ठीक है सब कुछ। सब इंतज़ाम बढ़िया है। फुन्नो तो पूरी तरह से तैयार है न?”

“हाँ-हाँ, बिल्कुल। लड़के वाले देखेंगे तो देखते रह जाएँगे मेरी सोना बिटिया को”

“बस फिर क्या टेंशन है” – पापा कहते और बाहर झाँकने लगते।

“आ जाएँगे-आ जाएँगे” – माँ कहतीं – “अब लड़के वाले हैं, आराम से, अपनी सहूलियत से आएँगे”

छ: बज गए, साढ़े छ:, पोने सात, सात। सात के बाद साढ़े सात और शाम ढल गई। रात ने अपनी कजरारी आँखों को धीरे-धीरे खोलना शुरु कर दिया। सभी इंतज़ार में बैठे रहे। भूख लगने लगी। पापा ने उन्हें फोन करने का सोचा ही था कि बाहर गाड़ी रुकने की आवाज़ आई।
वे लोग आ गए थे। सज-धज कर – पूरी फौज के साथ। पापा दरवाज़े की ओर भागे और स्वागत शुरु हो गया - ‘चलो भाई, दरवाज़ा खोलो उनके लिए’ ‘हाथ में कुछ बैग-वैग है तो ले लो’ ‘यहाँ बैठिए-इधर आइए’ - सब उनकी खातिरदारी में मन-प्राण से जुट गए। ‘अरे, समोसा लाओ भाई-जलेबी लाओ भाई’ ‘इनको दो-उनको दो’ ‘आप तो कुछ ले ही नहीं रहे’ ‘बहन जी, आप भी लीजिए-इसे अपना ही घर समझें’

फिर एक नया दौर चला। फुन्नो आई। बैठी। सबकी नज़रें उसके ऊपर, उसकी नज़रें नीचे। फिर चला ‘बातचीत’ का दौर। कई सारे सवाल – थोड़े से जवाब, कई तरह के सवाल – एक ही तरह का जवाब। लोगों ने फुन्नो को सवाल सुनते देखा, जवाब देते देखा, चुप रहते देखा, उठते देखा और फिर जाते देखा।

“दो दिनों में फोन करते हैं” – जाते समय उन्होंने कहा।

और दो दिन उत्सुकता, आशा, घबराहट, भावी योजनाओं के बीच बीत गए। फोन आया। दोपहर के तीन बजे।

“हाँ जी मिश्रा जी”

“जी-जी चौबे जी। मैं तो सुबह से ही आपके फोन का इंतज़ार कर रहा था”

“हाँ, मैं वो ज़रा व्यस्त था”

“जी-जी, कोई बात नहीं”

“तो, हमने सोचा है इस बारे में”

“जी” – मिश्रा जी के हाथ में थोड़े-बहुत पसीने आ रहे थे।

“बात ये है मिश्रा जी, कि” – आवाज़ थोड़ी रुकी – “देखिए मिश्रा जी, क्या है कि” – आवाज़ फिर रुकी – “....अब कैसे समझाऊँ आपको”

मिश्रा जी हाथ में आए पसीने की वज़ह से रिसीवर ढंग से पकड़ नहीं पा रहे थे – “नहीं-नहीं आप बताइए न, झिझकिए मत। खुलकर बात कहिए...अगर कोई लेन-देन की बात हो तो.....”

“नहीं-नहीं, वैसी कोई बात नहीं। दरअसल हमें लगता है कि” – आवाज़ फिर रुकी – “बुरा मत मानिएगा पर....आपकी बेटी ज़रा......कुछ हेल्दी है और हमारे बेटे को ज़रा दुबली, फिट टाइप की लड़की चाहिए। अब आजकल के लड़के हैं, मिश्रा जी। इनके अपने ही ढंग हैं। हमारी सुनते भी नहीं। लेकिन इससे हमारे-आपके पुराने संबंधों पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए”

शायद हाथ में आए अधिक पसीने की वज़ह से मिश्रा जी के हाथ से फोन का रिसीवर छूट गया था। उधर से आवाज़ आ रही थी – “अब शादी-ब्याह हमारे-आपके हाथ में तो है नहीं, ये सबकुछ तो भगवान ही कराता है, हम तो बस कोशिश ही कर सकते हैं.........” – मिश्रा जी ने गुलदस्ते के फूलों को बदलती फुन्नो को देखा। रिसीवर से आवाज़ का आना जारी था।