Friday, March 26, 2010
Saturday, March 6, 2010
कुछ ऐसे सरल उपाय जिन्हें अपनी दिनचर्या में शामिल करके आप तनाव और इसके प्रभावों को अपने-आप से कोसों दूर रख सकते हैं...पढ़िए,,आसान हैं और मजेदार भी!
हमने अक्सर लोगों से यह सुना है कि ज़िन्दगी हमें एक या अधिक-से-अधिक दो मौके देती है लेकिन यदि आप जीवन में अधिक से अधिक मौके पाना चाहते हैं तो हर परिस्थिति में अपने-आप को शांत और धैर्यवान बनाने की कोशिश कीजिए। हालांकि आज की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में हममें से अधिकतर लोग ऐसा कर नहीं पाते। बढ़ती महंगाई, बच्चों की पढ़ाई, करियर, डेडलाइनें, ट्रैफिक जाम,...कई ऐसी चीज़े हैं जिनसे बचा नहीं जा सकता। तनाव हमारे जीवन में ऐसा घर कर गया है कि इसे अपनी जीवनचर्या से निकालना असम्भव सा हो गया है।
शायद हममें से कई लोग यह नहीं जानते कि अधिक तनाव हमें कई तरह की शारीरिक समस्याएँ देता है, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं: मांसपेशियों का खिंचाव, चिंता, चक्कर आना, दिल की धड़कनों का तेज़ होना, सर में दर्द, भूख कम लगना, अस्थमा, मधुमेह, एलर्जी, पीठ का दर्द, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का कम होता जाना, हाईपरटेंशन होना, आत्मविश्वास की कमी, डर, डिप्रेशन, हृदय संबंधित रोग और यहाँ तक कि कैंसर भी। इसके अलावा तनाव की वज़ह से हमें अल्सर, माइग्रेन तथा पाचन संबंधित बीमारियाँ भी हो सकती हैं।
इन घातक बीमारियों का शिकार होने से बेहतर है कि हम तनाव को अपने जीवन से निकाल बाहर करें और यदि हम इसे अपने जीवन से निकाल नहीं सकते हैं तो इसे अपने ऊपर हावी न होने देने के तरीकों के बारे में जानें और इन बीमारियों से दूर एक बेहतर और खुशहाल जीवन बिताएँ। ऐसे कई तरीके हैं जिनकी मदद से हम इसी तनावग्रस्त दुनिया में रहते हुए और यही जीवन जीते हुए कई बीमारियों के जड़ इस तनाव से दूर रह सकते हैं। इन नुस्खों को अपनाइए और देखिए कि कैसे तनाव आपके लिए कम खतरनाक होता जाता है:
1. मसाज कराएँ – मसाज हमारे शरीर और मन दोनों को शिथिल करता है और यहीं से हमारे मन को शांति मिलनी शुरु होती है। कहते हैं जब शरीर को आराम मिलता है तो मानसिक चिंताएँ अपने-आप कम होने लगती हैं। मसाज हमारे रक्त संचार को बढ़ाता है और बढ़ा हुआ रक्त संचार हमारे शरीर को ताज़ा ऑक्सीजन लेने में सहायक होता है। और यह तो हम सभी जानते हैं कि ताज़ा ऑक्सीजन हमें कई बीमारियों से बचाता है। तो जब भी तनाव हो मसाज कराएँ और वैसे भी यह सुविधा तो आप घर बैठे प्राप्त कर सकते हैं। वैसे मसाज आपको टच थेरैपी भी उपलब्ध कराता है जो तनाव मिटाने में काफी सहायक सिद्ध होता है।
2. एक्यूप्रेशर और एक्यूपंचर: ये दोनों ही तनाव भगाने की एक बहुत ही कारगर और आसान तकनीक है क्योंकि आप इसे कहीं भी और कभी भी इस्तेमाल में ला सकते हैं। इनसे आप सर दर्द, एलर्जी, गर्दन और पीठ के दर्द तथा कई प्रकार के न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर इत्यादि से छुटकारा प्राप्त कर सकते हैं।
3. योग व व्यायाम: यह तो आजकल हम सभी जानते हैं कि नियमित योग, व्यायाम, सुबह-शाम की वॉक और साइकिलिंग जैसी गतिविधियाँ न हमें सिर्फ शारीरिक रूप से चुस्त-दुरुस्त रखती हैं बल्कि किसी भी प्रकार की नकारात्मक विचारों से दूर रख कर मानसिक रूप से भी फिट रखने में सहायक होती हैं।
4. हँसे-गाएँ: और न सिर्फ हँसे बल्कि खुल कर, जी भर कर हँसे, और यदि हँसी ऐसे न आए तो कोई कॉमेडी फिल्म देखें, कोई मज़ेदार पुरानी बात याद करें...
बच्चों के साथ खेलें या ज़ोर-ज़ोर से अपना पसन्दीदा गाना गाएँ, यह न सोचें कि पड़ोसी क्या कहेगा; सोचें कि अगर पड़ोसी कुछ कहेगा तो उसे भी साथ बिठा लेंगे गाने को।
5. कोई प्यारा सा जानवर पालें और उसके साथ खूब खेलें: तनाव भगाने का एक और भी बहुत कारगर तरीका है वह है पालतू जानवर। घर में कोई न कोई जानवर पालें - बेहतर होगा कि कुत्ते पालें क्योंकि कुत्ते प्यार दर्शाने में बहुत माहिर होते हैं और आपके प्रति अपने अन्दर के प्यार को सुबह-शाम दर्शाकर वे आपके अन्दर खुशी और उत्साह का संचार करते हैं। इसके अलावा कुत्ते आपको सुरक्षा का अहसास भी कराते रहते हैं।
6. कहीं घूमने जाएँ: मौका मिलते ही घूमने निकल जाएँ, यदि परिवार और दोस्त साथ हों तो क्या बात है, लेकिन यदि कोई साथ न आ पा रहा हो तो अकेले ही भ्रमण करें। अकेले घूमने से कई बार हमारा ध्यान उन चीज़ों पर जाता है जिनपर किसी के साथ रहने से हमारी नज़र तक नहीं पड़ती।
7. अपनी आलोचना को सकारात्मक रूप में लेना शुरु करें: हालांकि यह बहुत ही कठिन कार्य है लेकिन की गई आलोचना की कटुता को नज़रअन्दाज़ करते हुए इसकी सच्चाई पर ध्यान दें और उस क्षेत्र में सकारात्मक रूप से काम करना शुरु करें। याद रखें आलोचना ही हमें आगे भी बढ़ाती है और आलोचना ही हमें नीचे भी गिराती है, यह हमपर निर्भर करता है कि हम इसमें से क्या चुनते हैं।
8. तनाव में कोई निर्णय न लें|
9. खाली समय में कुछ रचनात्मक कार्य करें। किसी स्पोर्ट्स क्लब से जुड़ें और हर शाम नियमित रूप से वहाँ जाएँ, जी भर कर बच्चों की तरह खेलें या पोएट्री क्लब से जुड़ जाएँ, पेंटिंग बनाएँ, फोटोग्राफी करें या कुछ भी जो आपका शौक हो। अपने शौक का एक कलेक्शन बनाएँ और उसे प्रदर्शित करने के उपाय के बारे में सोचें।
10. किसी भी चीज़ की योजना पहले से बनाएँ। जल्दबाज़ी और अंतिम समय में बनाई गई योजनाएँ अक्सर खराब परिणाम देती हैं और फिर ये आपके तनाव का कारण बनती हैं।
11. लोगों के लिए कुछ अच्छा करें। चाहे छोटी-मोटी मदद हो या कोई बड़ी सहायता, किसी के मुस्कुराते चेहरे के साथ कहा गया ‘धन्यवाद’ शब्द हमें अन्दर तक खुश और संतुष्ट कर जाता है।
12. माफ करते चलें: माफ कीजिए और खुद ही देखिए कैसी अनुभूति होती है।
13. यदि आप तनाव देने वाली स्थिति में सुधार कर सकते हैं तो सकारात्मक सोच और पूरी दृढ़ता के साथ उसमें जुट जाइए लेकिन अगर स्थिति के बेहतरीकरण में आप कुछ नहीं कर सकते तो सोचिए कि जो हो रहा है, अच्छे के लिए हो रहा है। इससे भी बुरा हो सकता था।
14. और अंत में अगर आपकी चिंता करने से कुछ होता है तो अपने स्वास्थ्य की चिंता करनी शुरु कीजिए और देखिए तनाव कैसे खुद-ब-खुद आपसे दूर हो जाता है।
तो आज ही से इन गुरों को अपनाइए और ज़िन्दगी में मिलने वाले कई सारे मौकों को जीते जाइए।
शायद हममें से कई लोग यह नहीं जानते कि अधिक तनाव हमें कई तरह की शारीरिक समस्याएँ देता है, जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं: मांसपेशियों का खिंचाव, चिंता, चक्कर आना, दिल की धड़कनों का तेज़ होना, सर में दर्द, भूख कम लगना, अस्थमा, मधुमेह, एलर्जी, पीठ का दर्द, शरीर की प्रतिरोधक क्षमता का कम होता जाना, हाईपरटेंशन होना, आत्मविश्वास की कमी, डर, डिप्रेशन, हृदय संबंधित रोग और यहाँ तक कि कैंसर भी। इसके अलावा तनाव की वज़ह से हमें अल्सर, माइग्रेन तथा पाचन संबंधित बीमारियाँ भी हो सकती हैं।
इन घातक बीमारियों का शिकार होने से बेहतर है कि हम तनाव को अपने जीवन से निकाल बाहर करें और यदि हम इसे अपने जीवन से निकाल नहीं सकते हैं तो इसे अपने ऊपर हावी न होने देने के तरीकों के बारे में जानें और इन बीमारियों से दूर एक बेहतर और खुशहाल जीवन बिताएँ। ऐसे कई तरीके हैं जिनकी मदद से हम इसी तनावग्रस्त दुनिया में रहते हुए और यही जीवन जीते हुए कई बीमारियों के जड़ इस तनाव से दूर रह सकते हैं। इन नुस्खों को अपनाइए और देखिए कि कैसे तनाव आपके लिए कम खतरनाक होता जाता है:
1. मसाज कराएँ – मसाज हमारे शरीर और मन दोनों को शिथिल करता है और यहीं से हमारे मन को शांति मिलनी शुरु होती है। कहते हैं जब शरीर को आराम मिलता है तो मानसिक चिंताएँ अपने-आप कम होने लगती हैं। मसाज हमारे रक्त संचार को बढ़ाता है और बढ़ा हुआ रक्त संचार हमारे शरीर को ताज़ा ऑक्सीजन लेने में सहायक होता है। और यह तो हम सभी जानते हैं कि ताज़ा ऑक्सीजन हमें कई बीमारियों से बचाता है। तो जब भी तनाव हो मसाज कराएँ और वैसे भी यह सुविधा तो आप घर बैठे प्राप्त कर सकते हैं। वैसे मसाज आपको टच थेरैपी भी उपलब्ध कराता है जो तनाव मिटाने में काफी सहायक सिद्ध होता है।
2. एक्यूप्रेशर और एक्यूपंचर: ये दोनों ही तनाव भगाने की एक बहुत ही कारगर और आसान तकनीक है क्योंकि आप इसे कहीं भी और कभी भी इस्तेमाल में ला सकते हैं। इनसे आप सर दर्द, एलर्जी, गर्दन और पीठ के दर्द तथा कई प्रकार के न्यूरोलॉजिकल डिसॉर्डर इत्यादि से छुटकारा प्राप्त कर सकते हैं।
3. योग व व्यायाम: यह तो आजकल हम सभी जानते हैं कि नियमित योग, व्यायाम, सुबह-शाम की वॉक और साइकिलिंग जैसी गतिविधियाँ न हमें सिर्फ शारीरिक रूप से चुस्त-दुरुस्त रखती हैं बल्कि किसी भी प्रकार की नकारात्मक विचारों से दूर रख कर मानसिक रूप से भी फिट रखने में सहायक होती हैं।4. हँसे-गाएँ: और न सिर्फ हँसे बल्कि खुल कर, जी भर कर हँसे, और यदि हँसी ऐसे न आए तो कोई कॉमेडी फिल्म देखें, कोई मज़ेदार पुरानी बात याद करें...
बच्चों के साथ खेलें या ज़ोर-ज़ोर से अपना पसन्दीदा गाना गाएँ, यह न सोचें कि पड़ोसी क्या कहेगा; सोचें कि अगर पड़ोसी कुछ कहेगा तो उसे भी साथ बिठा लेंगे गाने को।
5. कोई प्यारा सा जानवर पालें और उसके साथ खूब खेलें: तनाव भगाने का एक और भी बहुत कारगर तरीका है वह है पालतू जानवर। घर में कोई न कोई जानवर पालें - बेहतर होगा कि कुत्ते पालें क्योंकि कुत्ते प्यार दर्शाने में बहुत माहिर होते हैं और आपके प्रति अपने अन्दर के प्यार को सुबह-शाम दर्शाकर वे आपके अन्दर खुशी और उत्साह का संचार करते हैं। इसके अलावा कुत्ते आपको सुरक्षा का अहसास भी कराते रहते हैं। 6. कहीं घूमने जाएँ: मौका मिलते ही घूमने निकल जाएँ, यदि परिवार और दोस्त साथ हों तो क्या बात है, लेकिन यदि कोई साथ न आ पा रहा हो तो अकेले ही भ्रमण करें। अकेले घूमने से कई बार हमारा ध्यान उन चीज़ों पर जाता है जिनपर किसी के साथ रहने से हमारी नज़र तक नहीं पड़ती।
7. अपनी आलोचना को सकारात्मक रूप में लेना शुरु करें: हालांकि यह बहुत ही कठिन कार्य है लेकिन की गई आलोचना की कटुता को नज़रअन्दाज़ करते हुए इसकी सच्चाई पर ध्यान दें और उस क्षेत्र में सकारात्मक रूप से काम करना शुरु करें। याद रखें आलोचना ही हमें आगे भी बढ़ाती है और आलोचना ही हमें नीचे भी गिराती है, यह हमपर निर्भर करता है कि हम इसमें से क्या चुनते हैं।
8. तनाव में कोई निर्णय न लें|
9. खाली समय में कुछ रचनात्मक कार्य करें। किसी स्पोर्ट्स क्लब से जुड़ें और हर शाम नियमित रूप से वहाँ जाएँ, जी भर कर बच्चों की तरह खेलें या पोएट्री क्लब से जुड़ जाएँ, पेंटिंग बनाएँ, फोटोग्राफी करें या कुछ भी जो आपका शौक हो। अपने शौक का एक कलेक्शन बनाएँ और उसे प्रदर्शित करने के उपाय के बारे में सोचें।
10. किसी भी चीज़ की योजना पहले से बनाएँ। जल्दबाज़ी और अंतिम समय में बनाई गई योजनाएँ अक्सर खराब परिणाम देती हैं और फिर ये आपके तनाव का कारण बनती हैं।
11. लोगों के लिए कुछ अच्छा करें। चाहे छोटी-मोटी मदद हो या कोई बड़ी सहायता, किसी के मुस्कुराते चेहरे के साथ कहा गया ‘धन्यवाद’ शब्द हमें अन्दर तक खुश और संतुष्ट कर जाता है।
12. माफ करते चलें: माफ कीजिए और खुद ही देखिए कैसी अनुभूति होती है।13. यदि आप तनाव देने वाली स्थिति में सुधार कर सकते हैं तो सकारात्मक सोच और पूरी दृढ़ता के साथ उसमें जुट जाइए लेकिन अगर स्थिति के बेहतरीकरण में आप कुछ नहीं कर सकते तो सोचिए कि जो हो रहा है, अच्छे के लिए हो रहा है। इससे भी बुरा हो सकता था।
14. और अंत में अगर आपकी चिंता करने से कुछ होता है तो अपने स्वास्थ्य की चिंता करनी शुरु कीजिए और देखिए तनाव कैसे खुद-ब-खुद आपसे दूर हो जाता है।
तो आज ही से इन गुरों को अपनाइए और ज़िन्दगी में मिलने वाले कई सारे मौकों को जीते जाइए।
Saturday, February 20, 2010
जली रोटी
कल रोटी बनाते समय
मेरा हाथ तवे से छू गया
जलन से मैं चिल्ला उठी
उस चीख में
अचानक एक और चीख मिल गई,
पड़ोस की माथुर आंटी की
जब दो महीने पहले
उन्हें ज़िन्दा जला दिया गया था,
उनकी शिफॉन की ख़ूबसूरत गुलाबी साड़ी
भयंकर काले रंग के कूड़े के ढेर में तब्दील हो गई थी,
एक छोटी सी मासूम लड़की की
जब फूल चुनने जाने पर
गार्डन में मालिक के कुत्ते ने
उसे काट खाया था,
उस लड़के की
जब कुछ लोगों ने
उसकी पीठ में छुरा भोंक दिया था
उसकी पॉकेट से तीन सौ दस रुपए लेने के लिए ,
उस लंगड़े भिखारी की
जिसकी नज़रें टिकी थीं
भीख में मिले दस रुपए पर
तब बत्ती हरी हो गई थी
और उसके पीछे बस खड़ी थी,
दंगे में हथियार लिए
गुस्से से पागल भीड़ से भागती,
अपने बच्चे को गोद में चिपटाए
एक माँ की
जिसके बेतहाशा दौड़ते पैर
कभी साड़ी में
तो कभी बुरके के घेरे में फंस जाते हैं,
और भी कई चीखें थीं
जो आपस में इतनी बुरी तरह गुँथीं थीं
कि उन्हें पहचानना मुश्किल था।
मैंने घबराकर अपने कान बन्द कर लिए,
आवाज़ें अभी भी आ रही थीं।
धीरे-धीरे करके जब वे खत्म हुईं
तो उस चीख के खत्म होने पर
एक अजीब मरघट-सी चुप्पी थी,
उस चुप्पी में कई ख़ामोशियाँ थीं
जो
कभी गुजरात में बैठे
एक बूढ़े की आँखों में पथराती हैं,
तो कभी
काश्मीर से भागे
एक पंडित की ज़ुबाँ से चिपक जाती हैं,
कभी सड़क पर पड़े
एक लड़के की लाश से होकर गुज़र जाती हैं
जो अभी कुछ देर पहले थरथराई थी,
कभी किसी चौराहे पर सोए
एक आधे-अधूरे कंकाल पर फैलती हैं
जो कभी शायद ज़िन्दा था,
कभी एक दुल्हन को छू जाती हैं
जिसकी जली हथेलियों में
कभी मेहन्दी भी लगी थी।
एक ऐसी ख़ामोशी
जो सबसे होकर गुज़र जाती है
और सभी चुपचाप, बस चुपचाप
खड़े रह जाते हैं।
मेरा ध्यान तवे पर गया
तवे पर रखी रोटी
बुरी तरह से जल चुकी थी।
मेरा हाथ तवे से छू गया
जलन से मैं चिल्ला उठी
उस चीख में
अचानक एक और चीख मिल गई,
पड़ोस की माथुर आंटी की
जब दो महीने पहले
उन्हें ज़िन्दा जला दिया गया था,
उनकी शिफॉन की ख़ूबसूरत गुलाबी साड़ी
भयंकर काले रंग के कूड़े के ढेर में तब्दील हो गई थी,
एक छोटी सी मासूम लड़की की
जब फूल चुनने जाने पर
गार्डन में मालिक के कुत्ते ने
उसे काट खाया था,
उस लड़के की
जब कुछ लोगों ने
उसकी पीठ में छुरा भोंक दिया था
उसकी पॉकेट से तीन सौ दस रुपए लेने के लिए ,
उस लंगड़े भिखारी की
जिसकी नज़रें टिकी थीं
भीख में मिले दस रुपए पर
तब बत्ती हरी हो गई थी
और उसके पीछे बस खड़ी थी,
दंगे में हथियार लिए
गुस्से से पागल भीड़ से भागती,
अपने बच्चे को गोद में चिपटाए
एक माँ की
जिसके बेतहाशा दौड़ते पैर
कभी साड़ी में
तो कभी बुरके के घेरे में फंस जाते हैं,
और भी कई चीखें थीं
जो आपस में इतनी बुरी तरह गुँथीं थीं
कि उन्हें पहचानना मुश्किल था।
मैंने घबराकर अपने कान बन्द कर लिए,
आवाज़ें अभी भी आ रही थीं।
धीरे-धीरे करके जब वे खत्म हुईं
तो उस चीख के खत्म होने पर
एक अजीब मरघट-सी चुप्पी थी,
उस चुप्पी में कई ख़ामोशियाँ थीं
जो
कभी गुजरात में बैठे
एक बूढ़े की आँखों में पथराती हैं,
तो कभी
काश्मीर से भागे
एक पंडित की ज़ुबाँ से चिपक जाती हैं,
कभी सड़क पर पड़े
एक लड़के की लाश से होकर गुज़र जाती हैं
जो अभी कुछ देर पहले थरथराई थी,
कभी किसी चौराहे पर सोए
एक आधे-अधूरे कंकाल पर फैलती हैं
जो कभी शायद ज़िन्दा था,
कभी एक दुल्हन को छू जाती हैं
जिसकी जली हथेलियों में
कभी मेहन्दी भी लगी थी।
एक ऐसी ख़ामोशी
जो सबसे होकर गुज़र जाती है
और सभी चुपचाप, बस चुपचाप
खड़े रह जाते हैं।
मेरा ध्यान तवे पर गया
तवे पर रखी रोटी
बुरी तरह से जल चुकी थी।
Saturday, February 6, 2010
बादलों की सफेदी पर...
बादलों की सफेदी पर अब काले रंग नहीं उभरते क्या?
दो छोटे-छोटे पंख लेकर पंछी भी अब उड़ान नहीं भरते क्या?
लगता है बारिश ने हमेशा-हमेशा के लिए घूंघट ओढ़ लिया है
हवाओं ने भी पीले-हरे पत्तों का दामन छोड़ दिया है।
आँखों से देखो तो आसमान नीला है
और आँखें बन्द करने पर कुछ दिखता ही नहीं
कोरे-कोरे कागज़ सब कोरे ही उड़ जाते हैं
क्या उनपर अब कोई अपना हाल-पता लिखता नहीं?
तितलियों और फूलों में भी बातचीत बन्द है शायद
उड़ते-खिलते दोनों एक-दूसरे को देखते तक नहीं,
या वे भी इंसानों की फेहरिस्त में आ गए
जो दोस्तों के दरवाज़े खटखटाना भूल गया,
अंगुलियों में अंगूठियाँ तो काफी हैं
पर उन अंगुलियों को कलम पकड़ाना भूल गया,
तालियों पर तालियाँ बजाता वह महफिल में
खुशी से पीठ थपथपाना भूल गया।
बादलों की सफेदी पर काले रंग नहीं आते अब
वे सब हमारे नाखूनों में उतरने लगे हैं
पेड़ तो बहुत हैं अपने हिस्से की छाया देते
पर छुईमुई के पौधे सब ज़मीन के नीचे सोने लगे हैं।
देखो ना ईश्वर तुम भी ज़रा झांककर
हर कोई इतना अलग-अलग, चुप-चुप, रूठा-रूठा सा क्यों है?
आँखों के मिलने पर मुस्कुराती हैं आँखें,
पर उन आँखों में कुछ झूठा-झूठा सा क्यों है?
मिलते हैं कभी-कभार हाथों से हाथ भी
पर उन हाथों में कुछ छूटा-छूटा सा क्यों है?
सोचो न तुम भी झाँको न एक बार
सबके लिए सबको मिलाओ न एक बार
क्या हुआ जो एक-दूसरे से टकराएँगे सारे
उस टकराहट में अपनापन मिलाओ न एक बार
सबको फिर से जिलाओ न एक बार
अंगुलियों को अंगुलियों से पिराओ न एक बार
धड़कनों को धड़कनों से मिलाओ न एक बार
बारिश के घूँघट को हटाओ न एक बार
आसमाँ पर काला रंग बिखराओ न एक बार
इस बारिश में तुम भी नहाओ न एक बार।
दो छोटे-छोटे पंख लेकर पंछी भी अब उड़ान नहीं भरते क्या?
लगता है बारिश ने हमेशा-हमेशा के लिए घूंघट ओढ़ लिया है
हवाओं ने भी पीले-हरे पत्तों का दामन छोड़ दिया है।
आँखों से देखो तो आसमान नीला है
और आँखें बन्द करने पर कुछ दिखता ही नहीं
कोरे-कोरे कागज़ सब कोरे ही उड़ जाते हैं
क्या उनपर अब कोई अपना हाल-पता लिखता नहीं?
तितलियों और फूलों में भी बातचीत बन्द है शायद
उड़ते-खिलते दोनों एक-दूसरे को देखते तक नहीं,
या वे भी इंसानों की फेहरिस्त में आ गए
जो दोस्तों के दरवाज़े खटखटाना भूल गया,
अंगुलियों में अंगूठियाँ तो काफी हैं
पर उन अंगुलियों को कलम पकड़ाना भूल गया,
तालियों पर तालियाँ बजाता वह महफिल में
खुशी से पीठ थपथपाना भूल गया।
बादलों की सफेदी पर काले रंग नहीं आते अब
वे सब हमारे नाखूनों में उतरने लगे हैं
पेड़ तो बहुत हैं अपने हिस्से की छाया देते
पर छुईमुई के पौधे सब ज़मीन के नीचे सोने लगे हैं।
देखो ना ईश्वर तुम भी ज़रा झांककर
हर कोई इतना अलग-अलग, चुप-चुप, रूठा-रूठा सा क्यों है?
आँखों के मिलने पर मुस्कुराती हैं आँखें,
पर उन आँखों में कुछ झूठा-झूठा सा क्यों है?
मिलते हैं कभी-कभार हाथों से हाथ भी
पर उन हाथों में कुछ छूटा-छूटा सा क्यों है?
सोचो न तुम भी झाँको न एक बार
सबके लिए सबको मिलाओ न एक बार
क्या हुआ जो एक-दूसरे से टकराएँगे सारे
उस टकराहट में अपनापन मिलाओ न एक बार
सबको फिर से जिलाओ न एक बार
अंगुलियों को अंगुलियों से पिराओ न एक बार
धड़कनों को धड़कनों से मिलाओ न एक बार
बारिश के घूँघट को हटाओ न एक बार
आसमाँ पर काला रंग बिखराओ न एक बार
इस बारिश में तुम भी नहाओ न एक बार।
Friday, January 29, 2010
बदनाम
"ये बदनाम गली है साहब, मैं इधर से नहीं जाऊँगा" - कहकर रिक्शे वाले ने रास्ता बदल लिया।
दूसरे ऊबड़-खाबड़ रास्ते से होकर हम अपने घर पहुँचे। घर, जिसे मैंने किराए पर लिया था दो महीने के लिए। पैसे देकर मैंने रिक्शे वाले से पूछा - "क्यों भई, वो गली बदनाम क्यों है?"
"क्योंकि वहाँ मीराबेन रहती है और वह अच्छी औरत नहीं है" - इतना कहकर फिर उसने कहा - "साहब आप भूलकर भी उधर मत जाइएगा, अच्छे लोग उस तरफ नहीं जाते"
रात के भोजन के बाद टहलने निकला। चलते-चलते उस तरफ निगाहें गईं। ना चाहने के बावज़ूद एक चाह हुई उधर जाने की।
वह गली सचमुच बदनाम होने योग्य थी। हवा में शराब की बदबू थी, हर थोड़ी दूर पर बोतलें बिक रही थीं, फिल्मों के पोस्टरों से घरों की दीवारें अटी पड़ीं थीं, जगह-जगह कुत्ते बैठे थे और यूँ घूर रहे थे मानो पता लगा रहे हों कि यह आदमी अच्छा है या बुरा; इस गली में आने योग्य है या नहीं, कहीं बल्ब तो कहीं लालटेन की धीमी रौशनी अंधेरे को दूर करने में कहीं सफल तो कहीं थोड़ा कम सफल हो रही थी।
लोग नशे में धुत थे या फिर होने की कोशिश कर रहे थे। हर जगह असभ्यता सड़ांध मार रही थी। कहीं घर के दरवाज़े टूटे पड़े थे तो कहीं खिड़कियाँ, तो कहीं दीवारों में ही छेद था। महिलाएँ पान वालों की दुकान पर पान खाकर होठों को लाल कर रहीं थीं - यह गली सचमुच बदनाम होने योग्य थी।
मैं घबराकर वहाँ से बाहर निकलने ही वाला था कि पीछे से किसी ने पुकारा - "ए बाबूजी"
मैंने मुड़कर देखा, नारंगी साड़ी में लिपटी एक आकर्षक युवती खड़ी थी।
मुस्कुराते, इठलाते, अपनी कमर पर एक हाथ रखकर उसने पूछा - "कहाँ जा रहे हो?"
मैंने बिना कुछ जवाब दिए घर की ओर पाँव बढ़ा दिए।
"मीराबेन से मिले बिना जा रहे हो? हमसे कुछ ख़ता हो गई क्या?" - कहकर वह हँसी, खुलकर हँसी; वैसे नहीं जैसे हमारे घर की महिलाएँ हँसती हैं। उस हँसी में जाने क्या था कि मैंने पलटकर उसे देखा।
वह अचानक चुप हो गई। कुछ देर मुझे देखा और बिना हिचकिचाहट मेरे पास आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा - "जाना चाहते हो? जाओ..."
मैं चल पड़ा।
गली के अंत तक आकर मैंने एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा।
मीराबेन अभी भी वहीं खड़ी थी।
इस बार उसने वहीं से पूछा - "क्यों आए थे?"
मैंने हकलाते हुए बड़ी मुश्किल से कहा - "नहीं....वो...ऐसे ही..."
वह फिर हँस पड़ी शायद मेरी हकलाहट पर, फिर संजीदा होकर बोली - "इस बदनाम गली में ऐसे ही?"
कहकर वह धीरे-धीरे चलते हुए मेरे पास आई।
कुछ देर चुप रहकर बोली - "जानते हो, अच्छे और बुरे लोगों में क्या अंतर होता है?" फिर ख़ुद ही उसने कहा - "अच्छे लोग अपनी अच्छाई से डरते हैं कि कही वह डगमगा न जाए पर बुरे लोग नहीं डरते, बुरे लोग ख़ुद पर विश्वास करते हैं, अच्छे लोग नहीं कर पाते" - मैं अचंभित होकर उसे देखता रह गया - इतना कहकर वह वापस मुड़ने को हुई।
इस बार मुझे न जाने क्या हुआ कि मैंने उसका हाथ पकड़ लिया -
"मीराबेन"
"बोलो"
"तुम ये सब क्यों करती हो?"
क्योंकि मुझे पसंद है, ये लोग, ये बातें, ये खुलापन, ये गली सब पसंद हैं मुझे"
"लेकिन इससे तुम्हारी बदनामी........" - कहकर मैं रुक गया।
"रुक क्यों गए? बोलो"
"क्या बोलूँ"
मीराबेन ने मेरा हाथ अपने दोनों हाथों में लेते हुए कहा - "यह बदनामी भी पसंद है मुझे"
"लेकिन......." - मैं कुछ बोलने ही वाला था कि उसने मेरा हाथ छोड़ते हुए कहा - "लेकिन क्या?........एक बात बताओ बाबू, तुम्हें कितने लोग पहचानते हैं और मुझे कितने लोग जानते हैं" - उसकी आँखों में विश्वास था, आवाज़ में कठोरता थी, होठों पर हँसी थी, मेरी आँखों में झाँकते हुए उसने कहा - "मैं बेशक बदनाम हूँ पर इधर-उधर चलते लोगों की तरह, तुम्हारी तरह गुमनाम तो नहीं" - कहकर वह फिर ज़ोर से हँसी, ऐसी हँसी जिसमें एक ऐसा आत्मविश्वास था जो उसका भी था और उसके जैसे कई औरों का भी था।
"ये बदनामी इस बात को सच करती है कि मैं जीवित हूँ"
मैं उसका चेहरा देखता रह गया और सलाम कर वह वापस चल दी हँसते-मुस्कुराते।
अचानक गली में कहीं दूर से किसी ने पुकारा - "अरे मीराबेन"
और मीराबेन उस तरफ मुड़ गई।
दूसरे ऊबड़-खाबड़ रास्ते से होकर हम अपने घर पहुँचे। घर, जिसे मैंने किराए पर लिया था दो महीने के लिए। पैसे देकर मैंने रिक्शे वाले से पूछा - "क्यों भई, वो गली बदनाम क्यों है?"
"क्योंकि वहाँ मीराबेन रहती है और वह अच्छी औरत नहीं है" - इतना कहकर फिर उसने कहा - "साहब आप भूलकर भी उधर मत जाइएगा, अच्छे लोग उस तरफ नहीं जाते"
रात के भोजन के बाद टहलने निकला। चलते-चलते उस तरफ निगाहें गईं। ना चाहने के बावज़ूद एक चाह हुई उधर जाने की।
वह गली सचमुच बदनाम होने योग्य थी। हवा में शराब की बदबू थी, हर थोड़ी दूर पर बोतलें बिक रही थीं, फिल्मों के पोस्टरों से घरों की दीवारें अटी पड़ीं थीं, जगह-जगह कुत्ते बैठे थे और यूँ घूर रहे थे मानो पता लगा रहे हों कि यह आदमी अच्छा है या बुरा; इस गली में आने योग्य है या नहीं, कहीं बल्ब तो कहीं लालटेन की धीमी रौशनी अंधेरे को दूर करने में कहीं सफल तो कहीं थोड़ा कम सफल हो रही थी।
लोग नशे में धुत थे या फिर होने की कोशिश कर रहे थे। हर जगह असभ्यता सड़ांध मार रही थी। कहीं घर के दरवाज़े टूटे पड़े थे तो कहीं खिड़कियाँ, तो कहीं दीवारों में ही छेद था। महिलाएँ पान वालों की दुकान पर पान खाकर होठों को लाल कर रहीं थीं - यह गली सचमुच बदनाम होने योग्य थी।
मैं घबराकर वहाँ से बाहर निकलने ही वाला था कि पीछे से किसी ने पुकारा - "ए बाबूजी"
मैंने मुड़कर देखा, नारंगी साड़ी में लिपटी एक आकर्षक युवती खड़ी थी।
मुस्कुराते, इठलाते, अपनी कमर पर एक हाथ रखकर उसने पूछा - "कहाँ जा रहे हो?"
मैंने बिना कुछ जवाब दिए घर की ओर पाँव बढ़ा दिए।
"मीराबेन से मिले बिना जा रहे हो? हमसे कुछ ख़ता हो गई क्या?" - कहकर वह हँसी, खुलकर हँसी; वैसे नहीं जैसे हमारे घर की महिलाएँ हँसती हैं। उस हँसी में जाने क्या था कि मैंने पलटकर उसे देखा।
वह अचानक चुप हो गई। कुछ देर मुझे देखा और बिना हिचकिचाहट मेरे पास आकर मेरे कंधे पर हाथ रखा और कहा - "जाना चाहते हो? जाओ..."
मैं चल पड़ा।
गली के अंत तक आकर मैंने एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा।
मीराबेन अभी भी वहीं खड़ी थी।
इस बार उसने वहीं से पूछा - "क्यों आए थे?"
मैंने हकलाते हुए बड़ी मुश्किल से कहा - "नहीं....वो...ऐसे ही..."
वह फिर हँस पड़ी शायद मेरी हकलाहट पर, फिर संजीदा होकर बोली - "इस बदनाम गली में ऐसे ही?"
कहकर वह धीरे-धीरे चलते हुए मेरे पास आई।
कुछ देर चुप रहकर बोली - "जानते हो, अच्छे और बुरे लोगों में क्या अंतर होता है?" फिर ख़ुद ही उसने कहा - "अच्छे लोग अपनी अच्छाई से डरते हैं कि कही वह डगमगा न जाए पर बुरे लोग नहीं डरते, बुरे लोग ख़ुद पर विश्वास करते हैं, अच्छे लोग नहीं कर पाते" - मैं अचंभित होकर उसे देखता रह गया - इतना कहकर वह वापस मुड़ने को हुई।
इस बार मुझे न जाने क्या हुआ कि मैंने उसका हाथ पकड़ लिया -
"मीराबेन"
"बोलो"
"तुम ये सब क्यों करती हो?"
क्योंकि मुझे पसंद है, ये लोग, ये बातें, ये खुलापन, ये गली सब पसंद हैं मुझे"
"लेकिन इससे तुम्हारी बदनामी........" - कहकर मैं रुक गया।
"रुक क्यों गए? बोलो"
"क्या बोलूँ"
मीराबेन ने मेरा हाथ अपने दोनों हाथों में लेते हुए कहा - "यह बदनामी भी पसंद है मुझे"
"लेकिन......." - मैं कुछ बोलने ही वाला था कि उसने मेरा हाथ छोड़ते हुए कहा - "लेकिन क्या?........एक बात बताओ बाबू, तुम्हें कितने लोग पहचानते हैं और मुझे कितने लोग जानते हैं" - उसकी आँखों में विश्वास था, आवाज़ में कठोरता थी, होठों पर हँसी थी, मेरी आँखों में झाँकते हुए उसने कहा - "मैं बेशक बदनाम हूँ पर इधर-उधर चलते लोगों की तरह, तुम्हारी तरह गुमनाम तो नहीं" - कहकर वह फिर ज़ोर से हँसी, ऐसी हँसी जिसमें एक ऐसा आत्मविश्वास था जो उसका भी था और उसके जैसे कई औरों का भी था।
"ये बदनामी इस बात को सच करती है कि मैं जीवित हूँ"
मैं उसका चेहरा देखता रह गया और सलाम कर वह वापस चल दी हँसते-मुस्कुराते।
अचानक गली में कहीं दूर से किसी ने पुकारा - "अरे मीराबेन"
और मीराबेन उस तरफ मुड़ गई।
Thursday, January 28, 2010
Tuesday, January 12, 2010
यार हवा
यार हवा
चुप रहो
मत बोलो इतने ज़ोर-ज़ोर से
ठंढ की भाषा
चुप रहो उसी तरह
जिस तरह
ये ऊँचे-ऊँचे पेड़ चुप हैं
तुम्हारे ये थपेड़े खाकर भी,
मत बोलो उसी तरह
जिस तरह
ये हरा-भरा मैदान
कुछ नहीं कहता
अपनी घास को सफेद बर्फ में
बदलते देखकर भी,
चुप रहो
जिस तरह
खिड़की के कोने में बैठी
वह बिल्ली चुप है
अपने-आप को
परदे के पीछे छुपाकर,
जैसे
ये सड़क चुप है
अपने ऊपर बर्फ का बोझ सहते हुए भी,
उसी तरह
जिस तरह
बाबा के आगे जलते
अलाव की आग
कुछ नहीं कहती,
वैसे ही जैसे
भूरा ओवरकोट पहने
मेरी पड़ोसन चुप है,
चुप रहो; क्योंकि
तुम्हारी यह भाषा बहुत ठंढी है
जो हमारे भीतर की गरमी सोख लेती है,
मत बोलो; क्योंकि
तुम्हारी यह तेज़ आवाज़
हमारी कई आवाज़ों को लील जाती है
और इसीलिए
इन सभी की तरह तुम भी
कुछ मत बोलो
चुप रहो,
यार हवा।
चुप रहो
मत बोलो इतने ज़ोर-ज़ोर से
ठंढ की भाषा
चुप रहो उसी तरह
जिस तरह
ये ऊँचे-ऊँचे पेड़ चुप हैं
तुम्हारे ये थपेड़े खाकर भी,
मत बोलो उसी तरह
जिस तरह
ये हरा-भरा मैदान
कुछ नहीं कहता
अपनी घास को सफेद बर्फ में
बदलते देखकर भी,
चुप रहो
जिस तरह
खिड़की के कोने में बैठी
वह बिल्ली चुप है
अपने-आप को
परदे के पीछे छुपाकर,
जैसे
ये सड़क चुप है
अपने ऊपर बर्फ का बोझ सहते हुए भी,
उसी तरह
जिस तरह
बाबा के आगे जलते
अलाव की आग
कुछ नहीं कहती,
वैसे ही जैसे
भूरा ओवरकोट पहने
मेरी पड़ोसन चुप है,
चुप रहो; क्योंकि
तुम्हारी यह भाषा बहुत ठंढी है
जो हमारे भीतर की गरमी सोख लेती है,
मत बोलो; क्योंकि
तुम्हारी यह तेज़ आवाज़
हमारी कई आवाज़ों को लील जाती है
और इसीलिए
इन सभी की तरह तुम भी
कुछ मत बोलो
चुप रहो,
यार हवा।
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