Saturday, September 24, 2011

अम्मा की कहानियाँ और मेरा बचपन - तोता और दाल की कहानी (आगे - दृश्य 23 और 24)

Scene 23


रनिवास का दृश्य। पलंग पर रानी डरी-सहमी एक कोने में खड़ी है। उसकी सभी सेविकाएँ किसी न किसी चीज़ (ड्रेसिंग टेबल, सोफा वगैरह) पर जा चढ़ी हैं। रानी के पास वही साँप, जिसे चिंटू ढूँढ रहा था, फन फैलाए खड़ा है और बीच-बीच में फुफकार रहा है।
रानी (डरते-डरते): “म-मुझसे क्या चाहते हो तुम? क्यों मेरे सामने इस तरह से फन फैलाए फुफकार रहे हो? मुझे डर लग रहा है, अरे उतरो पलंग से...क्या हार्ट अटैक करवाओगे मेरा?”
साँप: “ना रानी हार्ट अटैक नहीं, तुम्हें सिर्फ याद दिलाना चाहता हूँ”
रानी: “क्या?”
साँप: “याद है रानी एक तोता तुम्हारे पास एक फरियाद लेकर आया था”
रानी: “हाँ-हाँ, याद है। वो नामुराद....”
साँप (बीच में बात काटते हुए): “उस नामुराद की बात तुमने उस वक्त नहीं मानी थी”
रानी: “अरे, वो मुझे राजा को छोड़ने को कह रहा था, नामुराद!”
साँप (कुटिल मुस्कान मुस्कते हुए): “अगर मैं तुमसे कहूँ कि मैं भी तुम्हें वही करने कह रहा हूँ तो?”
रानी डर से उसे देखती है। साँप उसे देखकर थोड़ा और मुस्कुराता है।

Scene 24
मेज पर एक कागज रखा जाता है। मेज राजा के सामने रखी है। राजा राजदरबार में बैठे हैं। मंत्रीगण भी साथ में हैं। राजा (कागज़ देखकर): “ये क्या है?”
राजा के सामने एक सिपाही खड़ा है। उसी ने मेज पर वह कागज़ रखा है।
सिपाही: “जी, डाइवोर्स पेपर्स”
राजा: “क्या?” – सिपाही को देखकर – “मगर हमने तुमसे विवाह कब किया?”
सिपाही: “जी, मैंने नहीं, ये तो महारानी ने भिजवाया है आपके पास”
राजा (रिलैक्स्ड होते हुए): “ओहो, अच्छा अच्छा (फिर अचानक चौंकते हुए) क्या कहा? रानी ने भिजवाया?”
सिपाही: “जी”
राजा (जैसे उसे विश्वास नहीं हो रहा हो): “क्या सचमुच??”
सिपाही: “जी महाराज”
राजा की आँखों में आँसू आ जाते हैं। वो प्रधानमंत्री की ओर कागज़ दिखाकर उनसे कहते हैं।
राजा (प्रधानमंत्री की ओर कागज़ दिखाकर): “मंत्रा जी देख रहे हैं आप....आप देख रहे हैं न! ये डिवोर्स पेपर रानी ने हमें भेजा है...रानी ने खुद हमें भेजा है”
मंत्री (दुखी होते हुए): “जी महाराज, देख रहा हूँ इस मनहूस कागज़ को”
राजा (आश्चर्य से): “मनहूस कागज़!!”
मंत्री (दुखी होकर): “जी”
राजा: “लॉटरी टिकट कहिए इसे मंत्री जी! दस करोड़ का लॉटरी टिकट!”
मंत्री (आश्चर्य से): “जी!!!!”
तबतक काका और चिंटू दरबार में आते हैं।
राजा (तलाक के कागज़ों को अपनी आँखों से लगाते हुए): “आप नहीं जानते मंत्री जी, इन पेपर्स को देखने के लिए मेरी आँखें तरस गई थीं। (भावुक होकर) मैं-मैं तो इस दिन की कल्पना भी नहीं कर सकता था! सच है, सच है दुनिया में देर है अन्धेर नहीं! (फिर सम्हलकर) बताओ, बताओ मुझे कहाँ हस्ताक्षर करना है। लाओ, कोई कलम लाओ.....सिपाही कलम लेकर आओ”
चिंटू (काका से): “यहाँ तो उल्टा ही मामला हो गया”
काका: “कुछ करो तुरंत” चिंटू जल्दी से महाराज के पास जाता है।
चिंटू: “ठहरिए महाराज!”
राजा (चौंककर): “कौन? कौन है?”
चिंटू: “सरकार, मुझ नाचीज़ को चिंटू कहते हैं। आप इस पेपर पर हस्ताक्षर न करें, महाराज”
राजा: “मगर क्यों?”
चिंटू राजा से पेपर लेने की कोशिश करता है मगर राजा कागज़ को जोर से अपने सीने से लगा लेता है। चिंटू ज़रा जोर लगाकर राजा से कागज़ छीन लेता है।
चिंटू: “महाराज, आप रानी को क्यों छोड़ना चाहते हैं? वो इतनी अच्छी हैं, माशाअल्लाह इतनी खूबसूरत हैं! इतनी सह्रदया, इतनी दयालु हैं!”
राजा: “दूर के ढोल सुहावने चिंटू, पास रहे वो ही जाने” – कहकर अपने दोनों हाथों से चेहरा ढककर राजा फूट-फूटकर रोने लगता है।
चिंटू: “नहीं-नहीं महाराज! रोइए मत। आप जैसे शूरवीर, महावीर, कर्मवीर, धर्मवीर, युद्धवीर (अटक जाता है) युद्धवीर (कुछ और शब्दों को याद करता है) हाँ, शुद्धवीर (याद कर-करके बोलता है) कालवीर, भक्तिवीर, शक्तिवीर और भी जाने कौन-कौन से वीर को ये रोना-धोना शोभा नहीं देता”
राजा आँखें फाड़-फाड़कर चिंटू को देखता है। फिर अपने आँसू पोंछता है।
राजा: “हाँ, तुम सही कह रहे हो”
चिंटू: “और फिर महाराज, आपको अपनी रानी को डिवोर्स देने पर अपनी आधी सम्पत्ति देनी पड़ जाएगी”
राजा (सोचते हुए): “हूँ~~~”
चिंटू: “सोचिए महाराज ज़रा सोचिए, आप अपनी आधी जायदाद को यूँ ही कैसे जाने दे सकते हैं! आप ऐसा नहीं कर सकते महाराज!”
राजा: “हाँ, मैं ऐसा नहीं कर सकता”
चिंटू: “आप नहीं कर सकते”
राजा: “मै नहीं कर सकता”
ये पंक्तियाँ इन दोनों द्वारा तीन बार ऐसे ही दुहराई जाती हैं फिर राजा को अचानक जैसे होश आता है।
राजा (चिंटू से): “मगर मैं क्या नहीं कर सकता? दुनिया में ऐसी कौन सी चीज है जो मैं नहीं कर सकता!”
चिंटू: “आप डिवोर्स नहीं दे सकते”
राजा: “मगर क्यों?”
चिंटू (अपने सर पर हाथ मारते हुए): “ओफ्फ महाराज! क्योंकि आपको अपना आधा राज्य रानी को देना पड़ जाएगा और अपने पुरखों की मेहनत से बनाए गए इस राज्य को आप यूँ हीं रानी को नहीं सौंप सकते”
राजा: “हाँ, तुम सही कह रहे हो”
चिंटू: “मगर रानी तो नहीं मानेंगी ऐसे”
राजा: “तो?”
चिंटू: “तो ये राजन् कि आप ये पता लगवाएँ कि रानी के इस डिवोर्स पेपर भेजने के पीछे कारण क्या है?”
राजा (सहमति में): “हाँ-हाँ (सिपाही को बुलाता है) सिपाही”
सिपाही: “जी महाराज”
राजा: “महारानी की मांग क्या है?”
सिपाही: “जी वो चाहती हैं कि आप बढ़ई को जाकर डाँटें, जिससे वह बढ़ई खूँटे को चीर कर उसमें से दाल निकाले जिसे लेकर ये दोनों तोते परदेस जा सकें”
राजा (गुस्से से चिंटू को देखकर): “ओहो तो ये तुम दोनों की करतूत है!”
चिंटू: “नही महाराज! हम तो रानी के पास गए भी नहीं। उन्हें ज़रूर उनकी सखी चंद्रलता ने ये बातें बताई होंगी। जब मेरे पिताजी दाल के दाने के लिए परेशान हो रहे थे तब वे उस पेड़ के नीचे हीं थीं। उन्होंने ज़रूर हम दोनों की बातें सुनी होंगी और रानी को जाकर बताया होगा। महारानी से हमारा दुख देखा नहीं गया होगा और उन्होंने हमारे दुख को दूर करने का ये तरीका अपना लिया होगा”
राजा ‘हूँ’ कहकर सोचने की मुद्रा बनाता है।
चिंटू (दुखी होने की ऐक्टिंग करते हुए)कहता है: “महाराज हमने आपको इतनी अच्छी सलाह दी और आप हमारे ही ऊपर शक कर रहे हैं”
राजा: “नहीं-नहीं ऐसा नहीं है (सिपाहियों से) रानी की मांग पूरी होगी और इन दोनों भले पक्षियों का दुख दूर किया जाएगा। तत्काल सेना तैयार की जाए। रथ मंगवाएँ जाएँ”
सिपाही (सर झुकाकर): “जी” – कहकर जाने लगता है।
राजा: “और सुनो” सिपाही रुक जाता है और महाराज की ओर आज्ञा लेने के लिए उनकी ओर मुड़कर खड़ा हो जाता है। राजा: “इन दोनों तोतों के लिए भी रथ तैयार करवाएँ जाएँ, इसने हमें आज यह अहसास करवाया कि हमारी रानी कितनी दयालु हैं और इनकी वज़ह से आज मैं अपने आधे राज्य को खोने से भी बच गया। रथ तैयार करवाएँ जाएँ”
सिपाही: “जी महाराज” - कहकर चला जाता है।
चिंटू काका को मुस्कुराकर देखता है। काका थोड़ा घबराए हुए चेहरे से उसे देखता है। चिंटू उसे इशारे से चिंता न करने की सलाह देता है।



क्रमश:

4 comments:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  2. सुन्दर प्रस्तुति पर
    बहुत बहुत बधाई ||

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  3. आपका ब्‍लाग अच्‍छा लगा।
    धारावाहिक पोस्‍ट है। फुर्सत में पढूंगा।
    आभार...............

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