Monday, September 5, 2011

अम्मा की कहानियाँ और मेरा बचपन - तोता और दाल की कहानी (आगे - दृश्य 15 और 16)

Scene 15


काका, चिंटू और चूहा तीनों वहीं आते हैं जहाँ जाल रस्सी पर टँगा है। तीनों उसी जाल के पास आते हैं जिससे पहले मिल चुके थे। जाल उन्हें देखता है। जैसे ही उसकी नज़र चूहे पर पड़ती है वैसे ही वह उछल पड़ता है।
जाल (चूहे को देखकर चिंटू से कहता है): “अबे तू ये क्या उठा लाया? इस दँतनिकले को मुझसे दूर ही रखियो (चूहे को) चल भाग यहाँ से...भाग!”
चूहा: “चला जाऊँगा – चला जाऊँगा भइया, दरअसल मेरी दाँतों में ज़रा खुजली हो रही है”
जाल (पैनिक होकर): “तेरे दाँतों में खुजली हो रही है तो मैं क्या करूँ? मैं कोई खुजली की दवा हूँ क्या?”
चूहा: “हें-हें कुछ ऐसा ही समझ लो” – कहकर चूहा करीब आता है।
जाल ‘ए-ए’ कहकर चूहे से दूर हटता है।
चिंटू (जाल से): “अभी भी वक्त है जाल भाई, इसकी खुजली की दवा बनना है या गजराज को फँसाना है, सोच लो” जाल: “चल कहाँ चलना है, सोच लिया”
चूहा (खुश होकर, चिंटू से): “तो अब मैं जाऊँ?”
चिंटू: “हाँ भाई, तुम जाओ। फिर कभी ज़रूरत होगी तो आऊँगा.........या ऐसे भी मिलने आता रहूँगा”
चूहा: “हाँ-हाँ, बिल्कुल-बिल्कुल, जब मरजी हो आना लेकिन ज़रा अकेले हें-हें-हें”
चिंटू: “आपकी कृपा बनी रही तो तो अकेले ही आऊँगा”
काका (चिंटू से, मुस्कुराते हुए): “तो चलें गजराज के पास?”
चिंटू: “हाँ-हाँ नेक काम में भला देर किस बात की! क्यों जाल भइया?”
जाल कुछ नहीं कहता, बस बेमन से ‘चल’ कहता है।


Scene 15
हाथियों का समुदाय अभी भी वहीं नदी किनारे पड़ा है। रात होने वाली है इसलिए कुछ हाथी मोमबत्ती और लालटेन जला रहे हैं। कुछ हथिनियाँ स्टोव पर खाना बना रही हैं। कुछ बच्चे सो रहे हैं, कुछ चुपचाप बैठे हैं। अन्धेरा नहीं है पर रौशनी भी बहुत कम है। सबसे किनारे नेता हाथी बैठा है। सामने चिंटू, काका और जाल हैं।
नेता हाथी (गिड़गिड़ाते हुए): “देखो भाई, मैं आज़ादी पसन्द आत्मा हूँ। मुझे यूँ जाल में जकड़ दोगे तो मैं तो जीते-जी मर जाऊँगा। भगवान के लिए ऐसा मत करो”
चिंटू: “आज़ादी इतनी पसन्द है तो इसे बचाने के लिए थोड़ी मेहनत तो करनी पड़ेगी दादा”
नेता हाथी: “क्या करना है?”
चिंटू: “समुन्दर सुखाना है”
नेता हाथी (चौंककर): “क्या कहा? समुन्दर!! तुम्हें पता भी है कि समुन्दर कितना बड़ा होता है? मैं अकेला भला उसे कैसे सुखा सकता हूँ?”
काका: “तुम अकेले कहाँ हो भाई, पूरी फ़ौज़ है तुम्हारे साथ” – कहकर हाथियों के समूह की ओर हाथ दिखाता है।
नेता हाथी उन हाथियों की ओर देखता है। थोड़ी दूर चुप रहता है फिर चिंटू को देखकर कहता है।
नेता हाथी: “मुझे सबसे एकबार पूछना होगा”
चिंटू: “ठीक है, आप मीटिंग कर लें। तब तक हम भी थोड़ा सुस्ता लें” – कहकर चिंटू जम्हाई लेता है।
जाल: “लेकिन अपुन इतनी देर तक नहीं ठहरने वाला, या तो कहो तो अपना काम शुरु करूँ या फिर यहाँ से खिसकूँ” – कहकर खड़ा हो जाता है।
चिंटू (जाल को देखते हुए काका से कहता है): “पापा, उस चूहे के दाँत काफी बड़े थे न!” काका मुस्कुरा देता है।
जाल (वापस बैठते हुए): “अच्छा-अच्छा, ठीक है (नेता हाथी से) लेकिन मीटिंग ज़रा छोटी रखना”
नेता हाथी उन सभी हाथियों के बीच जाता है। यहाँ से काका, चिंटू और जाल बैठे उसे देख रहे हैं। नेता हाथी अपनी सूंड उठाकर ‘फुर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्र’ की आवाज़ निकालता है। सभी हाथी एकबार उसकी ओर देखते हैं। नेता हाथी वहाँ एक टीले पर बैठ जाता है। सभी हाथी जल्दी-जल्दी उसके इर्द-गिर्द बैठ जाते हैं। उनमें सूंड उठा-उठाकर काफी देर तक बहस चलती है। इस बीच चिंटू सो जाता है।
कुछ देर बाद नेता हाथी वापस आता है। काका चिंटू को उठाता है।
नेता हाथी: “चलो ठीक है, हम सभी तैयार हैं। पर अभी नहीं। अभी तुमलोग भी थक गए होगे, आराम से खाओ-पीओ और गहरी नींद सोओ। कल सुबह-सुबह हम सभी चलेंगे”
जाल: “खाना-पीना अच्छा कराना और अल्लसुबह ही चले देना और रात भर में कोई गड़बड़-घोटाला नहीं करने का”
नेता हाथी: “ठीक है, चलो। खाना तैयार है।”
चिंटू: “हा: हा: इसे कहते हैं आम के आम गुठलियों के दाम!”
सभी एक चट्टान पर बैठते हैं। उन तीनों के सामने बड़े से केले के पत्ते में पूरी, सब्ज़ी, हलवा, पकौड़े परोसा जाता है। तीनों खाने पर टूट पड़ते हैं।
चिंटू: “पापा, क्या हमें अंत में आइसक्रीम मिलेगी या फिर इस बगीचे के आम मिलेंगे?”
काका: “जो मिल रहा है चुपचाप खा लो, ज़्यादा फरमाइश कर दी तो आम क्या आम की गुठलियों के दाम भी नहीं मिलेंगे। ऊपर से ये हमारी ही गुठलियाँ निकाल लेंगे”


क्रमश:

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