Tuesday, January 12, 2010

यार हवा

यार हवा
चुप रहो
मत बोलो इतने ज़ोर-ज़ोर से
ठंढ की भाषा
चुप रहो उसी तरह
जिस तरह
ये ऊँचे-ऊँचे पेड़ चुप हैं
तुम्हारे ये थपेड़े खाकर भी,
मत बोलो उसी तरह
जिस तरह
ये हरा-भरा मैदान
कुछ नहीं कहता
अपनी घास को सफेद बर्फ में
बदलते देखकर भी,
चुप रहो
जिस तरह
खिड़की के कोने में बैठी
वह बिल्ली चुप है
अपने-आप को
परदे के पीछे छुपाकर,
जैसे
ये सड़क चुप है
अपने ऊपर बर्फ का बोझ सहते हुए भी,
उसी तरह
जिस तरह
बाबा के आगे जलते
अलाव की आग
कुछ नहीं कहती,
वैसे ही जैसे
भूरा ओवरकोट पहने
मेरी पड़ोसन चुप है,
चुप रहो; क्योंकि
तुम्हारी यह भाषा बहुत ठंढी है
जो हमारे भीतर की गरमी सोख लेती है,
मत बोलो; क्योंकि
तुम्हारी यह तेज़ आवाज़
हमारी कई आवाज़ों को लील जाती है
और इसीलिए
इन सभी की तरह तुम भी
कुछ मत बोलो
चुप रहो,
यार हवा।

6 comments:

  1. kya baat hai..pragya di
    bahut dino baad aayin wp v sudridh aur samsaamayik rachna ke saath.
    bahut sundar rachna

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  2. नमस्कार प्रज्ञा जी ........
    कुछ बातों में चुप रहना सामाजिक एवं व्यक्तिगत अनिवार्यता होती है क्योंकि खामोशी की भी अपनी एक आवाज होती है , लेकिन दुर्भाग्य कि यहाँ कोई चुप बैठने को तैयार ही नहीं !खामोशी की रंगत में मुह खोलना खामोशी के मस्त मौसम में दखलंदाजी करने का काम हैं ! बड़ी खुशी हुई कि तमाम व्यस्तताओं के बावजूद आपने खामोशी को एक नयी तान दी है जिसे हम साहित्य कि कविता विधा का अंग कहें या साहित्य का सृजन , कुछ भी कह कर अपने हार्दिक भावों का शतांश भी शब्दों में नहीं उकेर सकतें हैं ! मुझे आपकी इन पंक्तियों पर खुद कि लिखी एक नज़्म याद आ रही है पर उसका जिक्र करना ठीक नहीं होगा ............................बस इसी तरह लिखते रहिये क्योंकि हम लोग अब बोलना कम और सुनना ज्यादा पसंद करने लगे हैं क्योंकि बोलने के बड़े नुकसान हैं .............उक्त रचना के लिए धन्यवाद

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  3. thank u shashi..thank u shiva..:)
    अच्छा लगा ये जानकर कि आपलोगों को कविता अच्छी लगी..thank u!!

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  4. अब आप से चुप रहो तो कह नही सकते

    क्योंकी फिर इतनी सुन्दर रचना कैसे मिलेगी पढने के लिये

    स्वागतम !!

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